नई दिल्ली। स्मार्टफोन, टैबलेट और कंप्यूटर स्क्रीन पर 8 से 10 घंटे बिताने वाले कॉर्पोरेट कर्मचारियों, छात्रों और गेमर्स के बीच 'कंप्यूटर विजन सिंड्रोम' (CVS) और डिजिटल आई स्ट्रेन (Digital Eye Strain) के मामलों में 300% का उछाल आया है। ऑल इंडिया ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी (AIOS) के एक हालिया राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, 70% से अधिक नियमित स्क्रीन उपयोगकर्ताओं को आंखों में सूखापन, जलन, धुंधलापन और सिरदर्द की शिकायत रहती है। सामान्य स्थिति में एक इंसान 1 मिनट में लगभग 15 से 20 बार पलकें झपकाता है, परंतु स्क्रीन देखते समय यह दर घटकर मात्र 5 से 7 बार रह जाती है। इससे आंखों की कॉर्निया पर मौजूद आंसुओं की सुरक्षात्मक परत (Tear Film) सूखने लगती है। नेत्र रोग विशेषज्ञों ने आंखों की रोशनी को सुरक्षित रखने के लिए वैश्विक रूप से स्वीकृत 20-20-20 नियम और दैनिक देखभाल के वैज्ञानिक टिप्स जारी किए हैं।
क्या है डॉक्टरों का प्रसिद्ध '20-20-20' नियम?
अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी द्वारा विकसित यह नियम आंखों की सिलियरी मांसपेशियों (Ciliary Muscles) के तनाव को तुरंत दूर करता है:
- हर 20 मिनट बाद: लगातार स्क्रीन देखने के दौरान हर 20 मिनट का टाइमर लगाएं।
- 20 सेकंड का ब्रेक लें: स्क्रीन से अपनी नजरें पूरी तरह हटा लें।
- 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें: खिड़की से बाहर या कमरे के कोने में कम से कम 20 फीट (लगभग 6 मीटर) दूर रखी किसी भी वस्तु को 20 सेकंड तक लगातार देखें।
- परिणाम: दूर देखने से आंखों की फोकसिंग मांसपेशियां पूरी तरह रिलैक्स हो जाती हैं और आंखों पर पड़ने वाला दबाव तुरंत शून्य हो जाता है।
आंखों के तनाव और सूखेपन के मुख्य लक्षण
- आंखों में लगातार किरकिरापन, लाली और ऐसा लगना जैसे कोई धूल का कण फंसा हो।
- स्क्रीन पर बारीक अक्षर पढ़ने में अचानक धुंधलापन (Blurred Vision) महसूस होना।
- माथे और दोनों कनपटी में लगातार भारीपन और शाम होते-होते तेज सिरदर्द होना।
- अचानक तेज रोशनी या धूप के प्रति आंखों की संवेदनशीलता (Photophobia) बढ़ जाना।
- गर्दन, कंधों और पीठ के ऊपरी हिस्से में अकड़न आना।
डिजिटल स्क्रीन से आंखों को बचाने के 5 जरूरी नियम
- स्क्रीन की स्थिति और कोण: कंप्यूटर मॉनिटर आपकी आंखों के स्तर से 15 से 20 डिग्री नीचे और चेहरे से कम से कम 20 से 28 इंच (एक हाथ की दूरी) पर होना चाहिए। स्क्रीन की ओर कभी भी ऊपर न देखें।
- ब्लू लाइट फिल्टर और फॉन्ट साइज: अपनी सभी डिवाइसेज पर 'नाइट लाइट' या 'आई कम्फर्ट शील्ड' 24 घंटे ऑन रखें। बारीक फॉन्ट पढ़ने के बजाय स्क्रीन का डिस्प्ले स्केल 125% तक बढ़ा लें।
- कमरे की लाइटिंग: कभी भी पूरी तरह अंधेरे कमरे में बैठकर मोबाइल या लैपटॉप न चलाएं। स्क्रीन और कमरे की रोशनी में बहुत अधिक अंतर होने से आंखों पर दोहरा दबाव पड़ता है।
- आंखों को बार-बार झपकाना (Conscious Blinking): स्क्रीन पर काम करते समय जानबूझकर हर थोड़ी देर में तेजी से 10 बार पलकें झपकाएं। आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से प्रिजर्वेटिव-फ्री लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स (जैसे कार्बोक्सीमिथाइलसेल्युलोज) का उपयोग करें।
- आहार में ल्यूटिन और ओमेगा-3: गाजर, पालक, शकरकंद, अखरोट और अलसी के बीज में प्रचुर मात्रा में विटामिन ए, ल्यूटिन और ज़ियाक्सैन्थिन होता है जो रेटिना के मैकुला को नीली रोशनी से बचाते हैं।
"आंखें शरीर की सबसे नाजुक और अनमोल इंद्री हैं। दिनभर में कम से कम दो बार हथेलियों को आपस में रगड़कर आंखों पर रखें (Palming Technique), इससे आंखों की नसों को तुरंत ऊर्जा मिलती है।" - वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ, आरपी सेंटर, एम्स
💬 पाठकों की प्रतिक्रियाएं (0)
सभ्य और मर्यादित टिप्पणियों का स्वागत हैअभी इस खबर पर कोई टिप्पणी नहीं है। सबसे पहले अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करें!