बेगूसराय। समाज में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत किसी भव्य सरकारी योजना या विशाल बजट से नहीं, बल्कि आम नागरिकों के छोटे और निस्वार्थ संकल्प से होती है। गंगा तटीय क्षेत्र के अभावग्रस्त गांवों में स्थानीय युवाओं के एक समूह द्वारा शुरू किया गया "शिक्षा दीप" अभियान आज बेगूसराय और मुंगेर के सैकड़ों परिवारों के जीवन में आशा की नई किरण बन चुका है। जो बच्चे कल तक ईंट-भट्ठों पर काम करने या सड़कों पर भटकने को मजबूर थे, आज वे कंप्यूटर की-बोर्ड पर उंगलियां चला रहे हैं और डॉक्टर, इंजीनियर बनने के सपने देख रहे हैं।
📌 मुख्य बातें:
- युवाओं की पहल: कॉलेज के 15 छात्रों ने अपनी पॉकेट मनी बचाकर की थी शुरुआत, आज 120 से अधिक वॉलिंटियर्स जुड़े।
- 300+ बच्चों का दाखिला: सरकारी स्कूलों में औपचारिक प्रवेश कराने के साथ शाम को 3 घंटे की निशुल्क कोचिंग।
- डिजिटल साक्षरता केंद्र: पुराने लैपटॉप और कंप्यूटर दान में जुटाकर बनाई गई अत्याधुनिक कम्युनिटी लैब।
- पौष्टिक भोजन व स्वास्थ्य: प्रतिदिन पढ़ाई के बाद हर बच्चे को दूध, फल और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराया जाता है।
पॉकेट मनी से शुरू हुआ सफर, आज बना जन-आंदोलन
इस अभियान की शुरुआत दो वर्ष पूर्व स्थानीय कॉलेज के छात्र सुमित कुमार और उनके चार साथियों ने मिलकर की थी। उन्होंने देखा कि गंगा के दियारा क्षेत्र में बाढ़ और गरीबी के कारण दर्जनों बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। युवाओं ने अपनी मासिक जेबखर्च में से प्रति माह ₹500 का फंड बनाया और पेड़ की छांव में 10 बच्चों को ककहरा सिखाना शुरू किया।
धीरे-धीरे इस नेक पहल की जानकारी सोशल मीडिया और स्थानीय नागरिकों के माध्यम से फैली। प्रवासियों और स्थानीय व्यापारियों ने किताबें, स्टेशनरी और फर्नीचर उपलब्ध कराया। आज यह पहल एक औपचारिक ट्रस्ट का रूप ले चुकी है, जिसके तहत चार अध्ययन केंद्र संचालित हो रहे हैं।
"जब आप किसी बच्चे की आंखों में पहली बार अपनी किताब देखकर चमकते हुए देखते हैं, तो जीवन का असली उद्देश्य समझ आता है। शिक्षा ही वह एकमात्र हथियार है जो गरीबी के इस दुष्चक्र को हमेशा के लिए तोड़ सकती है।" — सुमित कुमार, संस्थापक, शिक्षा दीप अभियान
कम्युनिटी कंप्यूटर लैब में कोडिंग सीख रहे ग्रामीण बच्चे
गांव के पुराने पंचायत भवन में स्थापित किए गए डिजिटल केंद्र में आज 8 कंप्यूटर सक्रिय हैं। यहां बच्चों को बेसिक कंप्यूटर ज्ञान, टाइपिंग, इंटरनेट का सुरक्षित उपयोग और बुनियादी कोडिंग सिखाई जा रही है। इसके साथ ही, बच्चों की माताओं को भी डिजिटल साक्षरता और वित्तीय लेन-देन (UPI) का प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
स्थानीय प्रशासन ने भी इस पहल की सराहना करते हुए इसे जिले के अन्य प्रखंडों में मॉडल के रूप में लागू करने का आश्वासन दिया है। युवाओं की यह टीम साबित कर रही है कि यदि नीयत साफ हो और इरादे नेक हों, तो समाज का कोई भी कोना अंधेरे में नहीं रह सकता।
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